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विचारों, आचरण और व्यवहार पर जमी धूल को हटाती है सत्संग की गंगा

इन्दौर। हम सब जीवन में सुख-शांति, आनंद, भयमुक्त और निश्चिंत जीवन जीना चाहते हैं। यह भी चाहते है कि मरने के बाद दुनिया में हमारा नाम कायम रहे। हमारी खोज का केंद्र आनंद ही है। इस अभ्यास को करते हुए पता लगेगा कि आनंद वह फल है जो परमात्मा रूपी पेड़ पर लगता है। सुख और आनंद की तृष्णा निरंतर बढ़ती जाती है। जेसे जेसे उम्र बढ़ती है, हमारी कामनाए भी बढ़ने लगती है। तब लगता है कि जीवन का आनंद बीते हुए कल मे भी नहीं था और आने वाले कल मे भी नहीं रहेगा। वर्तमान मंे हर क्षण आनंद और प्रसन्नता में बिताएं, यहीं हमारा लक्ष्य होना चाहिए। हमारे इस जन्म में गुरू मिल जाए तो जीवन को दिशा मिल जाती है। सत्संग की गंगा हमारे विचारों, आचरण और व्यवहार पर जमी धूल को हटाकर मन को अशुद्धि से बचाती है। जीवन में व्यथा है तो व्यवस्था बदले, दशा खराब है तो दिशा सुधारें और चिंता को ठीक करना चाहते हैं तो अपना चिंतन सुधारें।    विश्व जागृति मिशन के संस्थापक आचार्य सुधांशुजी महाराज ने आज सुबह दशहरा मैदान पर विराट भक्ति सत्संग में  ं उपस्थित भक्तों की महती धर्मसभा को संबोधित करते हुए उक्त दिव्य विचार व्यक्त किए। प्रारंभ में मिशन की इंदौर शाखा की ओर से श्रीमती रेणुका पटवारी, राजेश पाराशर, नारायण नामदेव विजय खानचंदानी, राजेंद्र अग्रवाल, कृष्णमुरारी शर्मा, दिलीप बड़ोले, घनश्याम पटेल आदि ने सुसज्जित व्यासपीठ एवं आचार्यश्री का आत्मीय स्वागत किया। आनंद धाम से आए भजन गायकों महेश सैनी एवं आचार्य अनिल झा ने प्रारंभ में सुमधुर भजन प्रस्तुत किए। आज दूसरे दिन भी मैदान का विशाल पांडाल खचाखच भरा रहा। आचार्य सुधांशुजी केे मंच पर आते ही हजारों भक्तों ने खड़े हो कर जयघोष के बीच उनकी अगवानी की। कल शाम राज्य के खेल मंत्री जीतू पटवारी ने भी सत्संग में पहुंच कर आचार्यश्री से आशीष प्राप्त किए। सुबह के सत्र में आचार्यश्री ने ध्यान, योग एवं पा्रणायाम की अनेक विधियों का प्रशिक्षण भी दिया। उन्होने कहा कि ब्रम्हांड मंे बहुत सी शक्तियां मौजूद हैं जिन्हे एकाग्र करने के लिए बहुत से मंत्र हैं। हम रोज मंदिर जाते ही हैं, लेकिन अब जब भी जाएं, मन को प्रसन्न रख कर जाएं और पूरा ध्यान अपनी पूजा एवं जप-तप पर कंेद्रित रखें। इसके अद्भुत नतीजे प्राप्त होंगे। आचार्यश्री ने नवरात्रि को शक्ति का महापर्व बताते हुए भक्तों को ‘ओंम एंे व्हीं क्लीं चामुण्डाय विच्चै‘ मंत्र को कई बार दोहराया और इसका अर्थ तथा महत्व भी बताया। इसी तरह प्राणायाम में अनुलोम विलोम की क्रिया भी कराई और भक्तों से कहा कि हर सुबह भगवान से ऐसी विद्या मांगे, जो हमारे हर तरह के संकट और संशय को दूर कर हमारे मस्तिष्क को हर समय तरोताजा एवं ऊर्जावान बनाए रखे।  सुबह आधे घंटे शीशे के सामने खड़े रह कर आत्म संवाद करने की आदत बनाएं। खुद से बात करने का आनंद कुछ और ही आएगा। हमसे ज्यादा हमें कोई और नहीं जानता इसलिए स्वयं से पूछना चाहिए कि हम कौन है, कहां से आए हैं और क्या करना चाहते हैं। हमेशा मुस्कराते रहंे क्योंकि मुस्कराहट पर कोई टेक्स नहीं हैं। जैसे बच्चे को मां-बाप का आश्रय चाहिए वैसे ही हमें भी परमात्मा का आसरा चाहिए। दूसरों से बात करने में रोकटोक और निंदा आलोचना होती है लेकिन खुद से बात करते में कोई अड़चन नहीं आती इसलिए स्वयं से आत्म संवाद अवश्य करें। हर आदमी से बुराई छूटती नहीं और अच्छाई आती नहीं। इसके लिए 3 सप्ताह का समय तय करें और बुरी आदतों को 3 सप्ताह के लिए छोड़ दे ंतो हमेशा के लिए उनसे मुक्ति मिल सकती है। जीवन को व्यवस्थित बनाएं, खाने पीने और सोने आदि के समय निर्धारित करें। घर का वास्तु भी सुधारें। इसके लिए  दीवारें तोड़ने की जरूरत नहीं है। केवल सभी वस्तुएं निर्धारित जगह रखे और वापस वहीं रखें। घर को कबाड़ी की दुकान न बनाए।  सारी चीजें प्रबंधन और व्यवस्था से जुड़ी होना चाहिए। अंदर नहीं बदलेंगे तो बाहर भी कुछ नहीं बदल पाएगा।       आचार्य सुधांशुजी ने संगति का महत्व बताते हुए कहा कि हम सब सामाजिक प्राणी हैं। हमारे बहुत से जन्म पहले भी हुए हैं और आगे भी होंगे।  पिछले जन्मों का प्रभाव वर्तमान पर भी रहता है। पालन पोषण से ही हमारे संस्कारों का निर्माण होता है।  मां – बाप और शिक्षक से ज्यादा गुण हमें समाज सिखाता है। यदि हम चाहते हैं कि हमारा जीवन मूल्यवान बने तो जिस जमीन पर झाड़-झंखाड़ उग आएं हैं तो वहां उन्हे हटा कर फलों और फूलों के सुंदर पौधे लगाएं। मस्तिष्क भी एक जमीन की तरह ही है, जहां सुगंधित पौधे लगाएंगे तो विचार भी सुगंधित ही सृजित होंगे। यह हमारे विवेक पर निर्भर करता है कि हम क्या देखे, क्या न देखें। क्या खाएं और क्या न खाएं। क्या पहने और क्या न पहने। जिनकी संगत हमें आगे बढ़ाएं, उनके साथ जरूर बैठंे। मीठा बोलने वाले भी यदि घरों में आग लगाने का काम करते हो तो वे हमारे लायक नहीं हो सकते। हमारी संगत ऐसी होना चाहिए कि हमारी भौतिक उन्नति हो, परिवार में प्यार और एकता बढ़े तथा मन पर भक्ति का रंग चढ़े। बुराईयां सिखाने वालों से बच कर ही रहना चाहिए। विश्व जागृति मिशन इंदौर शाखा के राजेंद्र अगव्राल एवं कृष्ण मुरारी शर्मा ने बताया कि आचार्यश्री के प्रवचन  14 अप्रैल तक प्रतिदिन सुबह 8.30 से 11 एवं सांय 5 से 7.30 बजे तक होंगे। सुबह के सत्र में आज से योग, ध्यान एवं प्राणायाम का प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है। समापन दिवस 14 अप्रैल को दोपहर 12.30 बजे से मंत्र दीक्षा का कार्यक्रम भी होगा।

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